28 Feb, 2017: Massive Protest Against Killings in Rahariya and Public hearing on Police accountability

22 Feb


On First January, 2017, as the world rejoiced at the coming of the new year, two social-political activists in Araria district (Bihar) were killed by local landlords and their paid mercenaries as they were mobilising Dalits for their land rights. The two activists Kamleshwari Rishidev and Satnarayan Yadav, were affiliated to the CPI(ML). Houses of dalits were looted and the women were beaten and sexually assaulted. A three member fact finding team of the Jan Jagaran Shakti Sangathan (JJSS*) visited Rahariya, the village where the killings took place. The reports of the fact finding can be seen at twocircles.netsabrangindia and youth ki awaaz.


It was shocking to hear that not only could the local police not prevent the murder of the two activists, they were also silent witnesses to four Dalits being tied to a pole and mercilessly beaten at the “bathan” (farm house) of the landlord in full public view. Dalits who were assaulted told the fact team team that the landlords stopped the police from acting by openly reminding them of the bribes they had been paid for their inaction. It was only later when Police from the adjoining police station came that they rescued those tied to the pole, or else the death toll could have been higher on that fateful day.


Other than this, the JJSS members and ordinary people of Araria district face constant harassment by the Police, who hardly have any accountability towards the public. There are many cases of bribes being openly demanded to register cases, false cases are being registered against activists as deterrents to their work, no receipts are being given for applications filed at the police station, indecent behavior towards the complainant is rampant and so on. The range of treatment ordinarily expected by people from the police here is anything ranging from indifference to intimidation, a reason why people would rather resort to local panchayats than approach a system set up by the State specifically for ensuring public safety, security and peace. There are countless cases of women survivors, complainants and accused at police stations, having to deal with sexist stereotyping, character assassination, victim blaming – all amounting to sexual harrassment, stigma and added trauma for those already suffering. Other marginalised communities also continue living in inhibition and fear of the force. In the process, the one or two honest sincere, responsive members within the police also get their reputation maligned. All across the country just now, people are protesting draconian laws – whether it be AFSPA in Kashmir and parts of the North East or the Special Public Security Acts of Chattisgarh or Maharashtra because they all give State institutions like the police and army unchecked powers over the lives of ordinary citizens – powers that they are increasingly bent on abusing. Given this grim situation we have decided it is high time we responded to this slacking attitude of the police machinery and held them accountable to their duties and responsibilities. To this end we look forward to organizing a public hearing, along with the National Alliance of People’s Movements (NAPM) in Araria, Bihar on 28thFebruary, 2017 (Tuesday).


Public Hearing on Police Accountability and Police reforms

Date and Time : 28th February 2017 (11 am)

Venue : Town Hall, Araria, Bihar


Given your active interest in the field of social change, and focus on transparency and accountability in governance, we would like to invite you for this programme. We hope to start at 11 am and spend two to three hours on the public hearing, hearing those who have faced corruption and lack of accountability in the Police administration and also the opinion of the expert panelists. We would be inviting the police and civil administration, for this hearing. This public hearing would be followed by a massive rally in the town, to protest the Rahariya killings and establish the need for the Police Administration to be more accountable to ordinary citizens.


We sincerely hope you will be able to join us on the 28th of February, 2017 in this programme. We eagerly await your confirmation.


Thank you



Ranjit Paswan, Deepnarayan Paswan, Krishna Kumar Singh, Arun Yadav, Shivnarayan, Ashish Ranjan, Phool Kumari, Brahmanand Rishidev, Shivni Devi, Deepnarayan (Sikti), Asha Devi, Jitendra Paswan, Tanveer Alam, Sohini, Tanmay, Vijay, kamayani swami and all saathis at the JJSS


नजीर बना बिहार केंद्र भी पहल करे

4 Jul

कामायनी स्वामी और आशीष रंजन

यह लेख ३ जुलाई, २०१६ को राष्ट्रीय सहारा (हस्तक्षेप) में प्रकाशित हुआ |

ग्रामीण बिहार में अफसर को हुजूर कहकर संबोधित करना आम बात है | एक साधारण ग्रामीण मजदूर अपनी चप्पल उतारकर अभी भी जिला पदाधिकारी के कमरे में जाता है | सरकार को हम “माई बाप” मानते हैं | यह अंग्रेजों की गुलामी की विरासत है | इस “माई-बाप” वाली सरकार को हमारी सरकार में कैसे बदला  जाए एक गंभीर और चुनौतीपूर्ण विषय है  | सूचना का अधिकार आन्दोलन और उसके नतीजतन २००५ में बना सूचना का अधिकार कानून ने इस दिशा में कई दरवाजे खोले | पहली बार एक आम नागरिक  के पास ऐसा औजार आया जिससे वह “फाइलों” में दबी रहस्यों को साफ़ तौर पर जान सकें और सरकार से पूछताछ कर सके | अफसरशाही, भ्रष्टाचार और अकर्मण्यता से आहत सरकारें भी थीं और इसलिए उन्हें भी यह कानून काम का लगा | हालांकि वह आशंकित भी थे | कैसे सरकारी सेवा बिना दफ्तर के चक्कर लगाए और बिना घूस दिए लोगों लोगों को मिले एक अहम् चिंता का विषय और एक बड़ा राजनैतिक मुद्दा बना |  इस माहौल में बिहार सरकार ने एक कदम आगे रखते हुए अगस्त २०११ में बिहार लोक सेवायों का अधिकार अधिनियम, 2011 (RTPS) पारित किया |


इस कानून के तहत लोगों को समय सीमा के भीतर सरकारी सेवा पाने का अधिकार दिया गया  | सेवा पाने के लिए प्रखंड  स्थित RTPS काउंटर पर समुचित दस्तावेज के साथ आवेदन जमा करना होता है जिसकी रसीद मिलती है | समय सीमा के भीतर काम नहीं होने पर आवेदक ३० दिनों के भीतर अपीलीय प्राधिकार के पास अपील कर सकता/सकती है | अगर प्रथम अपील से संतुष्ट नहीं तो आवेदक ६० दिनों के अन्दर दूसरी अपील में जा सकता है | अपीलीय प्राधिकारों को वित्तीय दंड और विभागीय कारवाई करने की अनुशंसा करने की शक्ति प्रदान की गयी | कानून में 250 रु प्रति दिन के हिसाब से अधिकतम 5000 रु तक के दंड का प्रावधान है | द्वितीय अपील प्राधिकारी को अपीलीय प्राधिकारी को भी दण्डित करने की शक्ति दी गयी जो सूचना का अधिकार कानून से आगे का कदम है | लेकिन इस कानून में कई कमियाँ भी हैं | कोई स्वतंत्र अपीलीय प्राधिकार नहीं रखा गया | उसी विभाग के अधिकारी को अपीलीय प्राधिकार और द्वितीय अपीलीय प्राधिकार बनाने से अपील की व्यवस्था बेहद कमजोर कर दी गयी | इसके अतिरिक्त RTPS सभी सेवाओं पर लागू नहीं किया गया बल्कि जाति, आवासीय, आय प्रमाण पत्र, ड्राइविंग लाइसेंस और परिवहन विभाग से सम्बंधित कई काम, और सामाजिक सुरक्षा पेंशन, दाखिल खारिज, जैसे कुछ चुनिन्दा सेवाओं को ही RTPS के दायरे में रखा गया |

जमीनी हकीकत :

पहले जहां आवेदन की रसीद पाना भी एक कठिन काम था, RTPS का आना एक बड़ी बात थी | हाथ में रसीद होना आगे जाने का रास्ता खोलता है और “सिंगल विंडो” काउंटर होने के कारण लोगों को अफसरों/कर्मचारियों के पीछे भागने से राहत मिली | इस पूरे प्रक्रिया का कम्प्यूटरीकृत होने से काम पहले की अपेक्ष सरल और तेजी से होने लगा | लाइसेंस, आवासीय और जाति प्रमाण पत्र निर्गत पाना पहले की अपेक्षा आसान हुआ और भ्रष्टाचार कम हुआ लेकिन अन्य सुविधाओं के बारे में वही नहीं कहा जा सकता | अगर जल्दी में कोई भी प्रमाण पत्र चाहिए तो पहले की तरह ही कर्मचारी को घूस देनी पड़ती है | अभी भी निश्चित समय में सेवा प्रदान नहीं की जाती और अगर घूस के बिना चक्कर लगाना पड़ता है | सामाजिक सुरक्षा पेंशन पाने की राह और भी कठिन है | बिचौलियों और पंचायत प्रतिनिधि को बिना घूस दिए काम नहीं होता | अपीलीय व्यवस्था काम नहीं कर रही और कर्मचारियों को दण्डित ना के बराबर किया जा रहा है |

कई राज्यों में RTPS की तरह का कानून बना है | इस दौरान भ्रष्टाचार ओर “गवर्नेंस” को लेकर देश में जन उभार हुआ | सूचना के जन अधिकार का राष्ट्रीय अभियान (NCPRI) ने इसको लेकर कुछ कानून प्रस्तावित किये जिसमे शिकायत निवारण कानून प्रमुख था हालांकि पूरी कोशिशों के बावजूद यह कानून संसद में पारित नहीं हो पाया | 2015 में बिहार सरकार ने अग्रणी भूमिका निभाते हुए बिहार लोक शिकायत निवारण अधिकार कानून पारित किया | बिहार ऐसा कानून बनाने वाला पहला राज्य बना |

बिहार लोक शिकायत निवारण अधिकार अधिनियम, 2015

इस कानून के तहत व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी के समक्ष किसी सरकारी योजना, कार्यक्रम या सेवा के तहत फायेदा लेने के लिए अथवा फायेदा नहीं मिलने पर परिवाद दायर कर सकेंगे | शिकायत दायर करने के लिए सरकार “सूचना और सुकरण” केंद्र की स्थापना करेगी | लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी समय सीमा के अन्दर परिवाद दायर करने वाले को सुनवाई का अवसर देंगे और फिर उसपर निर्णय लेंगे | प्रत्येक लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी सप्ताह में कम से कम एक एक दिन परिवाद सुनने का दिन निश्चित करेगा | परिवादी अगर लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी के निर्णय से असंतुष्ट होता है या उसकी शिकायत दूर नहीं होती तो वह अपील कर सकेगा | अपील के दो स्तर हैं | कानून में दंड का भी प्रावधान है जो ५०० रु से लेकर अधिकतम ५००० रु तक है |

जमीनी हकीकत :
सरकार ने इस कानून के तहत नियमावली घोषित कर दी है | अब देखना है कि इसका कार्यान्वयन किस प्रकार से होता है |

बिहार की शिकायत निवारण कानून की एक बड़ी कमजोरी है कि वह शिकायत को सेवा/कार्यक्रम/योजना के ही दायर में देखता है जबकि शिकायत का स्वरुप कहीं अधिक वृहद् हो सकता है जैसा कि झालो देवी, ग्राम आमगाछी, प्रखंड सिकटी, अररिया के मामले में हुआ | उनका पेंशन पारित है लेकिन बैंक अकाउंट गलत होने के कारण उन्हें पेंशन नहीं मिल पा रहा, उपर्युक्त दोनों कानून में इस शिकायत के लिए जगह नहीं है | कई बार एक शिकायत कई विभागों को एक साथ छूती है | ऐसे मामलों में लोगों के शिकायत का निपटारा कैसे होगा यह देखना पडेगा | अपील के लिए कोई स्वतंत्र प्राधिकार नहीं बनाया गया | दंड का जो प्रावधान है वह काफी कमजोर है | पंचायत/प्रखंड स्तर पर ही सुनवाई और निपटारा होने से लोगों को सुविधा होती | कानून बनाने की पूरी प्रक्रिया में सरकार ने कोई व्यापक चर्चा नहीं की जिसके कारण कई जन पक्षिय प्रावधान कानून में शामिल नहीं हो सके | पारदर्शिता और जवाबदेही के सिद्धांतों पर ठीक से अमल करने की हिम्मत अभी भी सरकार ने नहीं दिखाई है लेकिन एक कदम आगे बढ़ने का श्रेय इन दोनों कानून के लिए बिहार सरकार को देना पड़ेगा |

हम कैसा देश बनाना चाहते हैं और किसके लिए देश बनाना चाहते हैं

6 May

हम कैसा देश बनाना चाहते हैं

और किसके लिए देश बनाना चाहते हैं


(बेगुसराय में वामपंथी नेता चंद्रशेखर की जन्मशती समारोह के मौके पर आयोजित विचार विमर्श में प्रस्तुति)


हमें कॉमरेड चंद्रशेखर को देखने का मौका नहीं मिला। हालाँकि हम जब कॉलेज में पहुँचे तो कॉमरेड चंद्रशेखर और उन जैसे लोगों की जिंदगी की कहानियाँ हमारे काम के लिए प्रेरणा बनीं। इसलिए कॉमरेड चंद्रशेखर की जन्‍मशति पर आयोजित कार्यक्रम में शामिल होकर मैं खुद को सम्‍मानित महसूस कर रहा हूं। मैं इसलिए भी सम्‍मानित महसूस कर रहा हूं कि इस मिट्टी से मेरा खास लगाव है। कन्‍हैया की ही तरह मेरी भी यहीं की मिट्टी में कहीं नाड़ गड़ी है। होशमंद जिंदगी में शायद दो या तीन बार ही बेगूसराय या बरौनी आने का मौका मिला है लेकिन बरौनी का नाम मेरी जिंदगी के हर दस्‍तावेज के साथ चस्‍पा है और ताउम्र रहेगा।

मुझे नहीं मालूम कि आयोजन समिति ने मुझमें ऐसा क्‍या पाया और मुझे आज के कार्यक्रम में आपके सामने खड़ा कर दिया। मैं कोशिश करूंगा कि अपनी पैदाइशी जमीन पर आप सब बड़े जनों के सामने मेरी जबान और पैर लड़खड़ाएँ नहीं।


आज की बातचीत का विषय है, हम कैसा देश बनाना चाहते हैं। मैं इसमें एक और लाइन जोड़ रहा हूँ, किसके लिए हम कैसा देश बनाना चाहते हैं। मेरी समझ में इसके साथ दो चीजें जुड़ी हैं। एक, यह देश की मौजूदा हालात की बात करता है और दूसरा, भविष्‍य में हम देश को कैसा देखना चाहते हैं, इसके भी संकेत देता है? यह विषय उतना ही बड़ा है जितनी बड़ी इस मुल्‍क की चौहद्दी। एक सिरा पकड़ेंगे तो चंद कदम ही चल पाएंगे। मैं भी आपके साथ चंद कदम चलते हुए कुछ संवाद करने की कोशिश करूँगा।


इस मुल्‍क में पिछले कुछ दिनों से नारों के जरिए ही संवाद हो रहा है। कुछ नारों के जरिए हमारी भारतीयता, देशभक्ति, राष्‍ट्रभक्ति तय की जा रही है। तो कुछ नारे इस मुल्‍क में कुछ नया गढ़ने की बात कर रहे हैं। नारों के जरिए कैसा देश बनाने की कोशिश हो रही है, यह समझने के लिए मैं आपके साथ कुछ चीजें साझा करूंगा। मैं टुकड़ों-टुकड़ों में कई बात कहने की कोशिश करूँगा। ऐसी उम्‍मीद है कि बाद में आप सवाल जरूर करेंगे ताकि कुछ बातें अगर साफ न हो पाई हों तो वे साफ हों। वैसे, मेरे पास भी सवाल ही ज्‍यादा हैं।

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Panchayat Election Ghoshna Patra

17 Apr

Apeal (Deepa Devi)-sarpanchApeal (Deepa Devi)-sarpanch

Apeal (Shah Matin) ward member

जानकारी, भागीदारी, सुनवाई, कारवाई और सुरक्षा से होगी लोकतंत्र की रक्षा – निखिल डे

17 Apr

प्रेस विज्ञप्ति

हमारा पैसा हमारा हिसाब

जानकारी, भागीदारी, सुनवाई, कारवाई और सुरक्षा से होगी लोकतंत्र की रक्षा – निखिल डे

अररिया 16.04.2016: देश भर में सूचना का अधिकार आन्दोलन की शुरुआत करने और सूचना का अधिकार कानून, 2005 बनाने में मुख्य भूमिका निभाने वाले प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे ने सर सैयद लाइब्रेरी में जन जागरण शक्ति संगठन और बिहार यूथ आर्गेनाईजेशन द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित परिचर्चा में अररिया शहर के आर. टी. एक्टीविस्ट, विद्यार्थियों और  प्रबुद्ध जनों को संबोधित किया |

श्री डे ने कहा कि देश में 80 लाख आर. टी. आई आवेदन हर साल किया जा रहा है और लोग “हमारा पैसा हमारा हिसाब” के नारा को जमीन पर उतार रहे हैं | उन्होंने कहा कि अगर अररिया के लोग सूचना से लैस होकर, अपनी समस्याओं और इलाके की समस्याओं को लेकर संग बैठने लगे तो बहुत परिवर्तन सम्भव है | जानकारी, भागीदारी, सुनवाई, कारवाई और सुरक्षा पाँच ऐसे मन्त्र हैं जो लोकतंत्र को बहुत मजबूत करेंगे | उन्होंने कहा कि हमें सबसे पहले जानकारी चाहिए कि हमारा  पैसा कहा खर्च हो रहा है लेकिन वह भी काफी नहीं इसलिए पैसा कैसे और किन चीज़ों में खर्च हो इसमें भागीदारी चाहिए | अगर चीज़ें ठीक नहीं तो हमारी शिकायतों की सुनवाई होनी चाहिए, उसकी लिखित प्राप्ति मिलनी चाहिए और फिर सुनवाई के बाद कारवाई होनी चाहिए | इन सभी चीज़ों में शिअकायत करने वालों की सुरक्षा सुनिश्चित होनी चाहिए क्यूंकि आज सबसे पहले हमला शिकायतकर्ता पर हो रहा है | उन्होंने कहा कि मध्यम वर्ग पढ़ा लिखा है इसलिए आर.टी.आई का इस्तमाल अच्छे से कर सकता है लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि सूचना के अधिकार आन्दोलन की शुरुआत तब हुई जब आकाल राहत कार्य पर काम करने

वाली अपढ़ महिलाओं ने अपनी मजदूरी के सवाल को लेकर कागज़ (मास्टर रोल , एम् बी.) दिखाने की मांग करने लगीं|

चर्चा में अररिया शहर में विभिन्न क्षेत्र में कार्यरत एवं सामाजिक रूप से सक्रिय कोगों ने भाग लिया जैसे डा एस आर झा, अजय कुमार सिंह, डा नैयर हबीब, कामायनी स्वामी, मो० जाहिद, मो० तौसीफ, मो० तारीक जितेन पासवान, आशीष रंजन, गोपाल अग्रवाल एवं कई अन्य नागरिक शामिल हुए |

संपर्क : मो० जाहिद (9471016322) कामायनी स्वामी (9771950248)

Press Release: Ambedkar Jayanti

17 Apr

प्रेस विज्ञप्ति  

डा. अम्बेडकर से लें प्रेरणा : संगठित हो कर संघर्ष करें – निखिल डे

जन जागरण शक्ति संगठन के कार्यकारिणी के सदस्यों ने मनाई अम्बेडकर जयन्ती

अररिया दिनांक 14.04.2015: जन जागरण शक्ति संगठन ने डा. अम्बेडकर द्वारा दिए गए नारे ‘शिक्षित हो! संगठित हो! संघर्ष करो!’ को बुलंद कर अम्बेड‍‍कर जयंती समारोह की शुरुआत की. यह समारोह जन जागरण शक्ति संगठन के केंद्र (आंबेडकर नगर, महात्मा गांधी मार्ग, APS के सामने) में संगठन की कार्यकारणी के विशेष सत्र के रूप में आयोजित किया गया था कार्यकारणी के सभी सदस्यों ने यह प्रण लिया की “डा. अम्बेडकर के नारे में अपना विश्वास दोहराते हुए हम यह प्रण लेते हैं की असपृश्यता और छुआ छूत से हर जगह लड़ेंगे”.

इस के साथ यह भी समझ बनाई गयी की ‘दलित’ सिर्फ जाती से नहीं होते बल्कि हर दबा-कुचला, शोषित-वंचित, महिला दलित है. राजस्थान के मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS) के प्रतिनिधि एवं सूचना के अधिकार कानून के संघर्ष में अग्रणी भूमिका निभाने वाले श्री निखिल डे ने अपनी बात रखते हुए दिल्ली में सफाई कर्मियों द्वारा निकाली गयी तीन माह की भीम यात्रा के दिल्ली में आयोजित समापन समारोह से प्रेरणा लेने के लिए कहा. उन्होंने यह भी कहा कि अम्बेडकर जिन्दगी भर सामाजिक और आर्थिक बराबरी के लिए लड़ते रहे | जाती व्यवस्था में निहित गैरबराबरी के खिलाफ उनकी मुहीम उनको सबसे अलग करती है | उन्होंने दलितों के मन में जोश और जाती व्यवस्था के खिलाफ लड़ने के लिए ऊर्जा पैदा की |

इस सन्दर्भ में संगठन ने ईमानदार प्रत्याशियों का पंचायत चुनाव में समर्थन करने का निर्णय भी लिया. हर प्रत्याशी जो संगठन के सहयोग से चुनाव लड़ रहे हैं वह एक घोषणा पत्र जनता में रख रहे हैं जिसमें प्रमुखता से घूस न लेने और देने की बात की गयी है. साथ ही वह कम पैसे में चुनाव लड़ रहे हैं. इसके अतिरिक्त शराब मुक्त पंचायत बनाने के लिए भी वादा कर रहे हैं. इसके साथ ही हर प्रत्याशी पारदर्शिता से पंचायत कार्य करने तथा सरकारी योजनाओं के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध रहने का भी वादा कर रहे हैं. इस सन्दर्भ में संगठन के सहयोग से 30 से अधिक प्रत्याशी अररिया, कटिहार, सहरसा और वैशाली जिलों में चुनाव में भाग ले रहे हैं.

बैठक की अध्यक्षता संगठन के अध्यक्ष कटिहार के श्री दीप नारायण पासवान ने की | बैठक में कामायनी स्वामी, रंजोत पासवान, शिवनारायण यादव, रीना देवी, ब्रह्मानन्द ऋषिदेव, मो0 अयूब, नीला देवी, जितेन पासवान, आशीष रंजन, मो0 जाकिर, कृष्ण कुमार सिंह और कार्यकारिणी के 200 सदस्य मौजूद थे |

जन जागरण शक्ति संगठन की ओर से:

रंजीत पासवान (9771899407), शिवनारायण (8757930443) आशीष (9973363664) अरुण यादव (8294807201) दीपनारायण (सिकटी) (9199067722) ब्रह्मानन्द ऋषिदेव (9572249913) शिवनी देवी, फूल कुमारी (9973448138)  तनवीर (9572759216) दीपनारायण पासवान (कटिहार) (9507420550)  कृष्णा कुमार सिंह(9199500585) आशा देवी जीतेंद्र पासवान, कामायनी स्वामी (9771950248)

नरेगा में पैसों का आकाल

17 Apr

प्रेस विज्ञप्ति

नरेगा में पैसों का आकाल

आज जब देश के दस राज्य और लगभग आधी जनसंख्यां आकाल की मार से जूझ रही है तो ऐसे में मनरेगा जैसा अति महत्वपूर्ण कार्यक्रम वृहद पैमाने पर काम में लाया जाना चाहिए | बिहार जैसे  राज्य में भी जहाँ पलायन बड़े पैमाने पर होता है, इस कानून का खास महत्व है | इस सन्दर्भ में यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि केन्द्र सरकार इस कार्यक्रम में पैसा समय से और पूरा नहीं दे पा रही है | सरकार के खुद के आंकड़े ही इस चित्र को स्पष्ट करते हैं  :-

    2015-16 में केन्द्र सरकार ने मात्र 34600 करोड़ का बजट मे प्रावधान किया | बजटीय भाषण में वित्त मंत्री ने यह वायदा किया था कि जरूरत पड़ने पर 5000 करोड़ दिए जायेंगे  लेकिन साल के अंत में भारत के उनतीस में से पच्चीस राज्यों में पैसों की इतनी कमी रही कि 8000 करोड़ मजदुरी बकाया थी और 4000 करोड़ का सामग्री की राशि बकाया थी | नरेगा का भुगतान 15 दिनों में होना चाहिए पर  साल के अंत में 70 लाख से ज्यादा मस्टर रोल का भुगतान 15 दिनों से अधिक समय से बकाया चल रहा था | दसों आकालग्रस्त राज्य में पैसा बकाया था जिससे मजदूरों को भयंकर मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था और उन्हें पलायन के लिए मजबूर होना पड़ रहा था |  ज्ञात हो कि नरेगा कानून के प्रावधानों के अनुसार हर समय राज्य सरकार के पास पैसा होना चाहिए ताकि समय पर काम काम मिले, आसानी से काम मिले, भुगतान 15 दिनों के अंदर हो और ग्रामीण इलाके में स्थायी संपत्ति का निर्माण हो | इस सब का असर इस साल और भी तीव्र होने लगा है | 2016-17 के 38500 करोड़ के बजट प्रावधानों में से 12000 करोड़ तो 2015-16 का बकाया चुकाने में ही चला  जायेगा | 2016-17 में बजट प्रावधानों  की  कमी को निम्न तरीके से समझा जा सकता है :-

  • राज्य सरकारों ने अपने लेबर बजट 314 करोड़ कार्यदिवस की मांग की जिसको केन्द्र सरकार ने काटते हुए मात्र 217 करोड़ को स्वीकृत किया
  • 217 करोड़ कार्य दिवस के लिए भी प्रति कार्य दिवस औसतन 250 रु प्रतिदिन (लेबर + सामग्री) के हिसाब से 54250 करोड़ की आवश्यकता है | इसका मतलब है कि सरकार के खुद की मानी हुई जरूरतों के हिसाब से 2016-17 का बजटीय प्रावधान आधा से भी कम है | जायज है कि कोई भी राज्य सरकार नरेगा को ढंग से चलाने में दिलचस्पी नहीं लेगी और इसका असर कानून का उन्लंघन होता है और मजदूरों को काम मांगने पर भी नहीं मिलता |

पैसे की कमी का असर बिहार के अंदर भी दिखता है | बिहार राज्य में 2015-16 में करीब 600 करोड़ रु मजदूरों का बकाया था | 2015-16 में बिहार राज्य में सिर्फ 1611 करोड़ ही खर्च हुए | यानी एक तिहाई से ज्यादा रकम लोगों का बकाया था | अररिया में 11.77 करोड़ रु लोगों का बकाया था |

नरेगा में प्रावधान है कि 15 दिनों के अंदर भुगतान नहीं होने पर 16 वें दिन से मुआवजा प्रारंभ होना चाहिए | भारत में पिछले वर्ष 206 करोड़ का मुआवजा मिलना चाहिए था लेकिन सरकारी आंकड़ों के अनुसार मात्र 3 करोड़ रु मुआवजे के रूप में दिए गए और सारी जगह कार्यक्रम पदाधिकारी ने पैसों के कमी को दर्शाते हुए मुआवजा देने से इनकार किया | बिहार में देरी से भुगतान के कारण जो ब्याज लोगों को मिलना चाहिए : 15.15 करोड़ रु, अररिया में देरी से भुगतान के कारण जो ब्याज लोगों को मिलना चाहिए : 39.71901 लाख रु जो मजदूरों को नहीं दिया गया |


इस सबसे स्पष्ट है कि केन्द्रीय सरकार नरेगा को पैसों की कमी से आकालग्रस्त कर रही है |


निखिल डे      कामायनी स्वामी      आशीष रंजन