No relief yet for Pellet Gun injured migrant worker of Araria

19 Jun

कश्मीर में पेलेट की बंदूक़ से चोटिल हुए अररिया के 17वर्षीय मज़दूर को एक महीने बाद भी कोई राहत नहीं

 

 

13 जून 2019 को जन जागरण शक्ति संगठन की एक चार सदस्यीय टीम शाहनवाज़ आलम के गाँव पथराहा, पंचायत घूरना, नरपतगंज प्रखंड (अररिया) गई. ज्ञात हो की अररिया जिला निवासी 17 वर्षीय शाहनवाज़ आलम कश्मीर के पुलवामा जिलामें काम करने गए थे और वहाँ 24 मई को वह स्थानीय लोगों और भारतीय सुरक्षाबलों में हुई एक झड़प में पेलेट गन फायरिंग का शिकार हो गए जिसमें उन्हें काफी चोट आई. टीम के सदस्यों की यह रिपोर्ट शाहनवाज और उनके परिवारजनों से हुई चर्चा के आधार पर लिखी गयी है :

24 मई 2019 को 17 वर्षीय शाहनवाज़ आलम की दुनिया अन्धकारमय हो गयी। बाक़ी दिनों की ही तरह शुक्रवार को दोपहर की नमाज़ के बाद शाहनवाज़ पास ही के बाज़ार से कुछ सामान लेने के लिए रुका। उसी समय कुछ शोर-शराबे की आवाज़ सुनाई दी। एक स्थानीय नेता की हत्या के विरोध में आए लोगों पर भारतीय आर्मी ने गोलीबारी शुरू कर दी। इसी दौरान गोलीबारी रुकने तक शाहनवाज़ पास ही एक गली में छुपा रहा। स्थिति शांत होने पर वह वहाँ से निकला, परंतु अचानक पेलेट की गोलियां फिर से चलने लगी. कुछ पेलेट शाहनवाज़ को भी लगे जिसके दर्द से वह वहीं बेहोश हो कर गिर पड़ा।

यहाँ यह उल्लेख कर दें कि कश्मीर में सुरक्षाबलों को छूट है कि हिंसात्मक तरीकों का इस्तमाल कर सकते हैं. केवल शक के बिनाह पर वह किसी के भी घर में छापा मार सकते हैं, किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकते हैं और यह इजाज़त उन्हें अफ्स्पा (AFSPA) जैसे कानूनों से मिलती है जो कश्मीर और भारत के कुछ गिने-चुने राज्यों में लागू है. कश्मीर में सुरक्षाबल जिन हिंसात्मक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं उनमें से एक है पेलेट की बंदूक़. इस बन्दूक से छोटे-छोटे धातु के टुकड़े निकलते हैं और बन्दुक की एक गोली में करीब 500 टुकड़े होते हैं. जब बंदूक चलती है तो ये 500 टुकड़े हवा में छितर जाते हैं और आस पास की किसी भी वस्तु में छेद कर प्रवेश कर जाते हैं |  भारतीय सुरक्षाबलों द्वारा लगातार ये दावा किया जाता है कि ये बन्दूकें घातक नही हैं, परन्तु इन गोलियों से पिछले कुछ सालों में बहुत सारे लोगों की जाने गयी हैं और सैकड़ों घायल हुए हैं। मानव अधिकारों की जाँच व निगरानी करने वाले कई समूहों जैसे ऐम्नेस्टी इंटर्नैशनल द्वारा इन बंदूक़ों पर पूर्ण रोक लगाने की लगातार माँग की जाती रही है लेकिन भारतीय सुरक्षाबलों द्वारा इसके प्रयोग में कोई कमी नहीं आई है |

उस दिन जब शाहनवाज़  दर्द से बेहोश हो कर सड़क पर गिरा पड़ा था तब कुछ कश्मीरी मज़दूरों ने उसे उठाकर स्थानीय अस्पताल में भर्ती करवा दिया। शाहनवाज़ के परिवार को उसी दिन सूचना दी गयी और उसके बड़े भाई शहवाज (उम्र 20 वर्ष) जो उस वक़्त अररिया, बिहार में थे तुरंत श्रीनगर के लिए रवाना हो गए। शाहवाज़ की शाहनवाज़  से मुलाक़ात श्रीनगर के महाराजा हरी सिंह अस्पताल में हुई। बिहार के एक मजदूर परिवार से आने वाले शाहवाज़ के पास इतने पैसे नहीं थे कि वे अपने भाई, शानावाज़ का ठीक से इलाज करा पाते और इन परिस्थितियों में कश्मीर में रह रहे मजदूर साथियों और मानवाधिकार संस्थानों ने उनकी मदद की. उन दिनों को दोहराते हुए वे बताते हैं*“जब हम कश्मीर में थे कई लोग हमारी मदद के लिए आगे आए। हमारे कश्मीरी भाई बहुत ही मेहरबान थे और उन्होंने हमारी बहुत देखभाल की। उन्होंने शाहनवाज़ को अस्पताल में भर्ती करवाया और इसकी सर्जरी के लिए कुछ रुपया इकट्ठा किया। इसके अलावा हमें कुछ मदद श्रीनगर जिले के कलेक्टर ऑफ़िस से आयी। एक और मदद हमें एक अनजान व्यक्ति द्वारा प्राप्त हुई जो अपनी तनख़्वाह का एक भाग ऐसे रोगियों की मददके लिए दान करते हैं। हमारी ख़ुशहाली पूछने के लिए कई पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा फ़ोन किया गया।अंत में सामाजिक कार्यों के एक समूह द्वारा हमारी वापसी की टिकेट करवायी गयी”। कश्मीर में आँखों के विशेषज्ञों की कमी के कारण और पेलेट से चोटिल लोगों की भारी संख्या के चलते दोनों भाइयों को पहली सर्जरी के बाद वहाँ से निकलना पड़ा।
दोनों भाइयों की ईद ट्रेन में ही गुज़री. कहाँ तो  बड़े भाई शाहवाज़कि शादी इसी अप्रैल को हुई थी और अगर शाहनवाज़ के साथ यह हादसा नहीं हुआ होता तो वह बड़े धूम धाम से, जितना एक औसत मेहनतकश परिवार में संभव है,  अपने परिवार के साथ ईद मनाता. अररिया पहुँचने पर, घर जाने के बजाये,  दोनों भाई सीधा नेपाल के लिए रवाना हो गए. नेपाल में बिराट नगर स्थित आँखों के अस्पताल में शाहनवाज़ को भर्ती कराया गया. यह भी कितनी अजीब बात है कि भारत के सुरक्षाबलों द्वारा चोटिल व्यक्ति को भारत में इलाज कराने के लिए कोई जगह नहीं मिली. जिस इलाज की ज़िम्मेदारी भारत की सरकार की होने चाहिए,उन्होंने शाहनवाज़ की मौजूदा हालत में सुधार लाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया. शाहनवाज़ के परिवार को पडोसी देश में उसका इलाज करवाना पड़ रहा है। नेपाल में शाहनवाज़ कीदूसरी सर्जरी हुई। लेकिन वहाँ भी डाक्टरों ने इन्हें आगाह कियाकि आँखों की रौशनी लौटने की सम्भावनाएँ बहुत ही कम हैं। निराशा के इस अँधियारे को साथ लेकर शाहनवाज़ अपने घर -अररिया जिले के नरपतगंज ब्लाक – वापस लौट आया। यहाँ उसका एक परिवार है जिसमें माँ बाप हैं, एक बड़ा भाई औरउसकी पत्नी, और तीन बहनें हैं |

शाहनवाज़ बताता है कि, “रोटी कमाने वाले हमारे घर में मैं और मेरा भाई ही हैं। और अब जब उसकी आँखों की रोशनी चलीगयी है तब घर चलाने की पूरी ज़िम्मेदारी उसके बड़े भाई शाहवाज़ के कंधों पर आ जाएगी.” कहाँ तो शाहनवाज़ पैसा कमाने दुसरे राज्य गया था, जो कि बिहार में, जहां रोज़गार के अवसर बहुत ही कम हैं, आम बात है और मजदूर रोज़गार की तलाश में बड़ी संख्या में दुसरे राज्य पलायन करते हैं, लेकिन इसबार जब वह घर लौट कर आया तो उसके हाथ में ना तो पैसा थाबल्कि वह शायद आगे पैसा कमाने की क्षमता भी खो चूका था.

जब शाहनवाज़ से पूछा गया कि वह मजदूरी करने कश्मीर ही क्यूँगया तो उसने अपनी आँख से पानी पोंछते हुए, कहा: *“कश्मीर दूर है, लेकिन मुझे कश्मीर जाना पसंद था क्यूँकि एक तो वहाँ मज़दूरी ज़्यादा मिलती है, दूसरा लोग भी अच्छे हैं और तीसरा मौसम भी ठंडा है जिसके कारण काम करने में भी मन लगा रहता है। इसके अलावा मैं किसी ठेकेदार पर भी निर्भर नही हूँ।वहाँ एक चौक है जहाँ मैं दूसरे मज़दूरों के साथ इंतज़ार करता हूँ। जिसे काम करवाना होता है वो ख़ुद लेने आता है जिससे हमें किसी के सामने काम के लिए झुकना नही पड़ता।“*

नेपाल में सर्जरी कराने के बाद, जब शाहवाज़ अपने भाई के साथ गाँव लौटा, उसको लगा कि बिहार से भी सरकारी अफसर,मीडिया वाले एवं सामाजिक कार्यकर्ता हौसला बढाने आयेंगे,जैसे कश्मीर में आए थे. आखिर, शाहनवाज़ के साथ जो हुआ हैं,वोह मामूली हादसा नहीं, एक घोर अन्याय हैं.  शहवाज आलम अफ़सोस के साथ कहते हैं, *“ऐसा लगता है यहाँ बिहार में कोई हमारा दर्द नही समझता। कोई हमसे मिलने नहीं आया, ना तो सरकार की तरफ़ से ना ही कोई मीडिया वाला। कम से कम कश्मीर में लोग हालचाल पूछने और मदद के लिए आते थे.”* ये बहुत ही अजीब बात है की जिन कश्मीरियों को सब मीडिया वाले आतंकवादी कहते हैं, वही सबसे ज़्यादा मदद करने आगे आए।शाहनवाज़ और उसका भाई इसी आशा में हैं की एक दिन बिहारकी सरकार उनके दर्द को समझेगी और उन्हें कोई न्याय मिलेगी।

हमारा अररिया के सभी लोगों से आग्रह है कि:

1) आप शाहनवाज़ और उनके परिवार जनों के लिए कुछ समय निकालें, उनसे मुलाक़ात कर उनका हौसला बढायें

2) सभी मीडिया कर्मी इस खबर को अररिया के मुख्या पृष्ठ में जगह दें ताकि लोगों को हमारे यहाँ की इस त्रासदी के बारे में पता चले

3) प्रशासन और सरकार के प्रतिनिधियों का भी ध्यान इस ओर आकर्षित करें और शहनवाज़ को उचित इलाज की व्यवस्था दिलाने में सहयोग करें

4) शाहनवाज़ इस पारिवार के एक कमाऊ सदस्य हैं, पर पेलेट इंजरी के नतीजतन वह कोइ काम करने लायक नहीं हैं| उनको और उनके परिवार को आपके और हमारे सहयोग और समर्थन की ज़रुरत है.
जन जागरण शक्ति संगठन की ओर से रणजीत पासवान, कल्याणी, अमर मेहता और तन्मय(7283096612)

 

 

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