नरेगा में पैसों का आकाल

17 Apr

प्रेस विज्ञप्ति
15.04.2016

नरेगा में पैसों का आकाल

आज जब देश के दस राज्य और लगभग आधी जनसंख्यां आकाल की मार से जूझ रही है तो ऐसे में मनरेगा जैसा अति महत्वपूर्ण कार्यक्रम वृहद पैमाने पर काम में लाया जाना चाहिए | बिहार जैसे  राज्य में भी जहाँ पलायन बड़े पैमाने पर होता है, इस कानून का खास महत्व है | इस सन्दर्भ में यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि केन्द्र सरकार इस कार्यक्रम में पैसा समय से और पूरा नहीं दे पा रही है | सरकार के खुद के आंकड़े ही इस चित्र को स्पष्ट करते हैं  :-

    2015-16 में केन्द्र सरकार ने मात्र 34600 करोड़ का बजट मे प्रावधान किया | बजटीय भाषण में वित्त मंत्री ने यह वायदा किया था कि जरूरत पड़ने पर 5000 करोड़ दिए जायेंगे  लेकिन साल के अंत में भारत के उनतीस में से पच्चीस राज्यों में पैसों की इतनी कमी रही कि 8000 करोड़ मजदुरी बकाया थी और 4000 करोड़ का सामग्री की राशि बकाया थी | नरेगा का भुगतान 15 दिनों में होना चाहिए पर  साल के अंत में 70 लाख से ज्यादा मस्टर रोल का भुगतान 15 दिनों से अधिक समय से बकाया चल रहा था | दसों आकालग्रस्त राज्य में पैसा बकाया था जिससे मजदूरों को भयंकर मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था और उन्हें पलायन के लिए मजबूर होना पड़ रहा था |  ज्ञात हो कि नरेगा कानून के प्रावधानों के अनुसार हर समय राज्य सरकार के पास पैसा होना चाहिए ताकि समय पर काम काम मिले, आसानी से काम मिले, भुगतान 15 दिनों के अंदर हो और ग्रामीण इलाके में स्थायी संपत्ति का निर्माण हो | इस सब का असर इस साल और भी तीव्र होने लगा है | 2016-17 के 38500 करोड़ के बजट प्रावधानों में से 12000 करोड़ तो 2015-16 का बकाया चुकाने में ही चला  जायेगा | 2016-17 में बजट प्रावधानों  की  कमी को निम्न तरीके से समझा जा सकता है :-

  • राज्य सरकारों ने अपने लेबर बजट 314 करोड़ कार्यदिवस की मांग की जिसको केन्द्र सरकार ने काटते हुए मात्र 217 करोड़ को स्वीकृत किया
  • 217 करोड़ कार्य दिवस के लिए भी प्रति कार्य दिवस औसतन 250 रु प्रतिदिन (लेबर + सामग्री) के हिसाब से 54250 करोड़ की आवश्यकता है | इसका मतलब है कि सरकार के खुद की मानी हुई जरूरतों के हिसाब से 2016-17 का बजटीय प्रावधान आधा से भी कम है | जायज है कि कोई भी राज्य सरकार नरेगा को ढंग से चलाने में दिलचस्पी नहीं लेगी और इसका असर कानून का उन्लंघन होता है और मजदूरों को काम मांगने पर भी नहीं मिलता |

पैसे की कमी का असर बिहार के अंदर भी दिखता है | बिहार राज्य में 2015-16 में करीब 600 करोड़ रु मजदूरों का बकाया था | 2015-16 में बिहार राज्य में सिर्फ 1611 करोड़ ही खर्च हुए | यानी एक तिहाई से ज्यादा रकम लोगों का बकाया था | अररिया में 11.77 करोड़ रु लोगों का बकाया था |

नरेगा में प्रावधान है कि 15 दिनों के अंदर भुगतान नहीं होने पर 16 वें दिन से मुआवजा प्रारंभ होना चाहिए | भारत में पिछले वर्ष 206 करोड़ का मुआवजा मिलना चाहिए था लेकिन सरकारी आंकड़ों के अनुसार मात्र 3 करोड़ रु मुआवजे के रूप में दिए गए और सारी जगह कार्यक्रम पदाधिकारी ने पैसों के कमी को दर्शाते हुए मुआवजा देने से इनकार किया | बिहार में देरी से भुगतान के कारण जो ब्याज लोगों को मिलना चाहिए : 15.15 करोड़ रु, अररिया में देरी से भुगतान के कारण जो ब्याज लोगों को मिलना चाहिए : 39.71901 लाख रु जो मजदूरों को नहीं दिया गया |

 

इस सबसे स्पष्ट है कि केन्द्रीय सरकार नरेगा को पैसों की कमी से आकालग्रस्त कर रही है |

 

निखिल डे      कामायनी स्वामी      आशीष रंजन

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: